सात चक्रों की अवधारणा भारतीय योग और तांत्रिक परंपराओं के कुछ मानचित्रों में मिलती है। इसे आध्यात्मिक अभ्यास और आत्म-चिंतन की भाषा के रूप में समझें; चक्रों को आधुनिक शरीर-विज्ञान में प्रमाणित अंग या ऊर्जा केंद्र मानने का वैज्ञानिक आधार स्थापित नहीं है।
सात चक्रों की पारंपरिक सूची
अनेक लोकप्रिय प्रस्तुतियों में मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार का उल्लेख होता है। अलग-अलग परंपराओं में व्याख्या, प्रतीक और अभ्यास भिन्न हो सकते हैं।
शुरुआती ध्यान
आराम से बैठें, शरीर को स्थिर लेकिन सहज रखें और सामान्य सांस पर ध्यान दें। चाहें तो शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर क्रम से ध्यान ले जाकर सुरक्षा, स्थिरता, करुणा, अभिव्यक्ति और आत्म-चिंतन जैसे गुणों पर विचार करें।
कुंडलिनी अभ्यास में सावधानी
तीव्र श्वास, लंबे कुम्भक या कठिन बंध-मुद्राओं से स्वयं शुरुआत न करें। अनुभवी और जिम्मेदार शिक्षक के मार्गदर्शन में धीरे आगे बढ़ें।
अभ्यास का उद्देश्य
ध्यान को अनुभव और आत्म-अवलोकन की प्रक्रिया समझें। किसी विशेष अनुभूति या चक्र जागरण को हासिल करने का दबाव न लें और रोजमर्रा के स्वास्थ्य/मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए उचित सहायता लें।
लेखक: Mukesh, Ashtangaa Yoga with Mukesh. अभ्यास अपनी क्षमता और योग्य मार्गदर्शन के अनुसार करें।
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